नई दिल्ली (नेहा): एक समय था जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते थे। अगर विदेशी निवेशक पैसा निकालते थे, तो भारतीय शेयर बाजार क्रैश हो जाता था। पर अब समय के साथ घरेलू निवेशकों की भागीदारी बढ़ने से हालात बदले हैं। विदेशी निवेशक प्रभाव तो रखते हैं, पर कई कारणों से ये प्रभाव बहुत कम हो गया है। भारतीय बाजार घरेलू निवेशकों के सपोर्ट और कई अन्य फैक्टर्स के चलते काफी आत्मनिर्भर हो गया है।
घरेलू म्यूचुअल फंड (DMF) ने FY26 की पहली तिमाही में कुल मार्केट कैपिटल के हिसाब से NSE-लिस्टेड कंपनियों में रिकॉर्ड 10.6% ओनरशिप हासिल की, जिससे लगातार दूसरी तिमाही में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) पर उनकी बढ़त और बढ़ गई। ऐसा पिछली बार 2003 में हुआ था। यह वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच लगातार घरेलू खरीदारी को दर्शाता है और अब DMF के पास फ्लोटिंग स्टॉक में FPI की तुलना में बड़ी हिस्सेदारी है।
NSE-लिस्टेड फर्मों में कुल FPI ओनरशिप घटकर 17.3% (कुल मार्केट कैपिटल के हिसाब से) रह गई, जो दिसंबर 2011 के बाद से सबसे कम है। नेट FPI इनफ्लो साल 2025 में अब तक -95,641 करोड़ रुपये पर निगेटिव हो गया, जो अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक अस्थिरता के बीच निवेशकों के अलर्ट होने का संकेत है।