नई दिल्ली (नेहा): नाबालिग बेटी से दुष्कर्म कर उसे गर्भवती करने के दोषी पिता की उम्रकैद की सजा को दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति प्रतिबा एम सिंह व न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने कहा कि अपने बच्चे की सुरक्षा करना एक पिता का फर्ज है और इस तरह के कृत्य के लिए उसे कोई रियायत नहीं दी जा सकती। अदालत ने दोषी करार देने के ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए दोषी व्यक्ति की अपील याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि भले ही पीड़िता और उसकी मां ट्रायल के दौरान अपने बयान से पलट गई थीं, लेकिन व्यक्ति को इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती है।
पीठ ने भ्रूण के डीएनए टेस्ट के नतीजे को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता ने अपनी ही बेटी के साथ शारीरिक संबंध बनाए थे और एक पिता व बेटी के रिश्ते को देखते हुए एक भयानक अपराध था। घटना के दौरान पीड़िता की उम्र 14 साल की थी। मामले पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि परिवार की सामाजिक परिस्थितियां और आर्थिक स्थिति ने पीड़िता और उसकी मां को विरोधाभासी बयान देने या अपने बयान से पलटने के लिए मजबूर किया होगा।
हालांकि, ऐसे मामलों में कोर्ट रिकार्ड पर आए वैज्ञानिक सुबूतों को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं कर सकता। पीठ ने यह भी कहा कि अदालत की राय में सजा को निलंबित करने की मांग वाली अर्जी पूरी तरह से बेकार है। ट्रायल कोर्ट ने जुलाई 2025 में अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पाक्सो) अधिनियम के तहत दुष्कर्म, गंभीर यौन उत्पीड़न और आपराधिक धमकी के अपराधों के लिए दोषी ठहराया था।
ट्रायल कोर्ट ने अगस्त 2025 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी। प्राथमिकी के अनुसार पीड़िता उस समय तीन महीने की गर्भवती थी और अपनी मां के साथ पुलिस स्टेशन गई थी। पीड़िता ने बताया था कि जब वह सो रही थी तो उसके पिता ने जबरदस्ती उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे।


