नई दिल्ली (नेहा): अलग रह रही महिला को गर्भपात कराने के लिए दर्ज मामले में मुक्त करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि कोई महिला गर्भधारण जारी नहीं रखना चाहती तो उसे मजबूर करना उसकी शारीरिक अखंडता (बाॅडिली इंटेग्रिटी) का उल्लंघन है और इससे उसका मानसिक आघात बढ़ता है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने वैवाहिक कलह के मामले में 14 सप्ताह के भ्रूण का चिकित्सकीय गर्भपात कराने वाली अलग रह रही महिला की याचिका पर उक्त निर्णय दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (एमटीपी) अधिनियम में गर्भपात के लिए पति की सहमति अनिवार्य नहीं है।
महिला की प्रजनन स्वायत्तता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा बताते हुए अदालत ने कहा कि प्रजनन पर नियंत्रण सभी महिलाओं की मूलभूत आवश्यकता और अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक कलह की स्थिति में महिला को गर्भपात का अधिकार मान्य है, क्योंकि यह उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।


