सोनभद्र (नेहा): प्रदेश के अंतिम विधानसभा क्षेत्र दुद्धी के सपा विधायक विजय सिंह गोंड का निधन गुरुवार को हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। विजय सिंह गोंड ने 2024 के उपचुनाव में भाजपा के श्रवण गोंड को 3160 मतों से हराकर यह सीट जीती थी। इससे पहले, 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने दुद्धी विधानसभा से रामदुलार गोड़ को 6297 मतों के भारी अंतर से हराया था।
दुद्धी विधानसभा (403) आदिवासी बाहुल्य आरक्षित सीट है, जहां विजय सिंह गोंड ने लगातार सात बार विधायक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। 2017 से यहां भाजपा का शासन था, लेकिन लगभग तीन साल पहले भाजपा के पूर्व विधायक पर दुष्कर्म के आरोप में सजा होने के बाद हुए उपचुनाव में विजय सिंह गोंड़ ने सपा के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी। उनका निधन सपा के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि वे न केवल विधायक रहे, बल्कि सपा सरकार में मंत्री भी रहे हैं।
विजय सिंह गोंड का राजनीतिक करियर उनके समर्पण और जनता की सेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक था। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया और अपने क्षेत्र के विकास के लिए निरंतर प्रयास किए। उनके निधन से उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं में गहरा शोक है। विजय सिंह गोड़ का निधन न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि उनके समर्थकों और पार्टी के लिए भी एक अपूरणीय क्षति मानी जा रही है।
दुद्धी विधायक विजय सिंह गोंड का उपचार एसजीपीजीआइ लखनऊ में चल रहा था। वे लंबे समय से वे बीमार चल रहे थे। बतााया जा रहा है उनकी दोनों किडनी खराब हो गई थी। उन्हें आदिवासी राजनीति का ‘पितामह’ भी कहा जाता था। दुद्धी और ओबरा विधानसभा को अनुसूचित जनजाति सीट घोषित कराने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी थी। वनवासी सेवा आश्रम में मात्र 200 रुपये मासिक मानदेय पर कार्यरत रहते हुए उन्होंने 1979 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव जीता। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
1989 में अपने राजनीतिक गुरु रामप्यारे पनिका को हराकर उन्होंने आदिवासी राजनीति में नया अध्याय लिख दिया। विभिन्न दलों से होते हुए वे लगातार सात बार विधानसभा के सदस्य रहे। आठवीं बार 2022 में वह विधायक बने थे। उन्होंने सदन में आदिवासी समाज के अधिकारों को मजबूती से उठाया और उन्हें मुख्यधारा में लाने का उल्लेखनीय प्रयास किया। विजय सिंह गोंड के निधन से राजनीतिक, सामाजिक और आदिवासी समुदाय में गहरा शोक व्याप्त है। नेता, कार्यकर्ता और समर्थक उनके निधन को अपूरणीय क्षति मान रहे हैं।


