रांची (नेहा): आज झारखंड के ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन का जन्मदिन मनाया जा रहा है। 4 अगस्त 2025 को उनके निधन के बाद भी उनकी यादें और योगदान आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। आदिवासी समाज के मसीहा, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और तीन बार मुख्यमंत्री रहे शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, साहस और जनसेवा की एक जीती-जागती मिसाल है। जानें उनके जीवन और संघर्ष से जुड़े पांच किस्से।
1. 15 साल की उम्र में ही शिबू सोरेन का जीवन पूरी तरह बदल गया। 27 नवंबर 1957 को उनके पिता शोबरन सोरेन (जो शिक्षक और आदिवासी हितैषी थे) की लुकैयाटांड जंगल में साहूकारों द्वारा कथित तौर पर हत्या कर दी गई। इस घटना ने युवा शिबू को झकझोर दिया। पढ़ाई छोड़कर उन्होंने महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ आदिवासियों को संगठित करना शुरू किया। यही घटना उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट बनी, जिससे बाद में ‘धन कटनी’ आंदोलन शुरू हुआ और आदिवासी भूमि वापसी की लड़ाई तेज हुई।
2. शिबू सोरेन को दिशोम गुरु (देश/भूमि का गुरु) की उपाधि कैसे मिली, इसकी एक रोचक लोककथा है। 1970 के दशक में जब वे आदिवासी भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों को बाहर निकालने के लिए रात में छापेमारी कर रहे थे, तो एक बार एक गांव में ऐसा ‘चमत्कार’ हुआ। लोग बताते हैं कि उनकी मौजूदगी में ही जमीन से जुड़े विवाद हल हो जाते थे और लोग उन्हें दैवीय शक्ति वाला मानने लगे। आदिवासी बुजुर्गों ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि दे दी, जिसका अर्थ संथाली में ‘भूमि का गुरु’ होता है। यह नाम उनके संघर्ष और जन-संपर्क से जुड़ा हुआ है।
3. 1960-70 के दशक में शिबू सोरेन ने पारसनाथ और तुंडी के घने जंगलों में रात्रि पाठशाला (नाइट स्कूल) शुरू की। गरीब आदिवासी बच्चे जो दिन में मजदूरी करते थे, उन्हें रात में पढ़ाने लगे। ये स्कूल सिर्फ अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं थे — वहां शिबू सोरेन बच्चों को आत्मनिर्भरता, महाजनी प्रथा के खिलाफ जागरूकता और शराब छोड़ने की शिक्षा भी देते थे। इन स्कूलों ने उन्हें ‘गुरुजी’ का दर्जा दिलाया और आदिवासी समाज में शिक्षा की अलख जगाई।
4. 1970 के दशक में शिबू सोरेन ने ‘धन कटनी आंदोलन’ चलाया। महाजन आदिवासियों की जमीन हड़प लेते थे और उनकी फसल पर कब्जा कर लेते थे। शिबू सोरेन ने अपने समर्थकों के साथ रात में खेतों में जाकर फसल काट ली और उसे असली मालिकों को लौटा दिया। इस आंदोलन ने सैकड़ों गांवों को महाजनों के चंगुल से मुक्त कराया। यह आंदोलन इतना प्रभावी हुआ कि बाद में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की नींव पड़ी।
5. शिबू सोरेन का जीवन कई कानूनी चुनौतियों से भरा रहा। 2006 में अपने पूर्व निजी सचिव शशीनाथ झा हत्याकांड में उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई (बाद में 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट ने बरी कर दिया)। सजा सुनने के बाद 2007 में जब उन्हें दुमका जेल ले जाया जा रहा था, तो उनके काफिले पर बम हमला हुआ, लेकिन कोई हताहत नहीं हुआ। इस घटना ने भी उनके साहस को दिखाया। वे कई बार जेल गए, लेकिन आदिवासी हितों के लिए लड़ते रहे। वरिष्ठ पत्रकार राकेश परिहार बताते हैं कि शिबू सोरेन सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के लिए एक जीवंत प्रतीक थे। आज उनके जन्मदिन पर पूरा झारखंड उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। दिशोम गुरु अमर रहें!


